राजपुरोहित जाति का संक्षिप्त इतिहास

यह संक्षिप्त इतिहास सर्वप्रथम प्रकासित पुस्तक रिपोर्ट तरदु- मषुमारी राज मारवाड़ सन् 1891 के तीसरे हिस्से की दुप्राप्य प्रति राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर में उपलब्ध है, से संकलित किया गया हैं। इसके अतिरिक्त अन्य सामग्री का भी प्रयोग किया गया है। इसके द्वारा हमें प्रत्येक खोपों की जानकारी प्राप्त होती है। आषा है समाज के प्रत्येक वर्ग को रूचिकर एवं नई जानकारी प्राप्त होगी। (पुस्तक की मौलिकता को ध्यान में रखते हुए भाषा नहीं बदली गई है।) मारवाड़ एवं थली में राजपुरोहित (जमीदार) अन्य ब्राह्मणों की अपेक्षा अधिक है। ये लोग राजपुतों के मौरूसी गुरू है और पिरोयत (पुरोहित) कहलाते है। अगर हम इतिहास पर एक दृष्टि डालें तो पायेंगे की राजपुताने में राजपुरोहितों का इतिहास में सदैव ही ऐतिहासिक योगदान रहा है। ये राज- परिवार के स्तम्भ रहे है। इन्हे समय-समय पर अपनी वीरता एवं शौर्य के फलस्वरूप जागिरें प्राप्त हुई है। उत्तर वैदिक काल में भी राजगुरू पुरोहितों का चयन उन श्रेठ ऋशि-मुनियों में से होता था, राजनीति, सामाजिक नीति, युद्धकला, विद्वता चरित्र आदि में कुषल होते थे। कालान्तर में यह पद वंषानुगत इन्ही ब्राह्मणों में से अपने-अपने राज्य एवं वंष के लिए राजपुरोहित चुने गये। इसके अतिरिक्त राजाओं की कन्याओं के वर ढूंढना व सगपन हो जाने पर विवाह की धार्मिक रीतियां सम्पन्न करना तथा नवीन उत्तराधिकारी के सिंहासनासीन होने पर उसका राज्याभिषेक करना आदि था। ये कार्य राज-परिवार के प्रतिनिधि व सदस्य होने के कारण करते थे। वैसे साधारणतय इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि मात्र था। पिरोयतों की कौम एक नही अनेक प्रकार के ब्राह्मणों से बनी है। 1 पराचीन काल - पराचीन काल में राजपुरोहित राजा का परतिनिधि होता था। राजा की अनुपसथ्तिि में राजकारय राजपुरोहित दवारा समपनन होता था। वह राजय का परमुख मंतरी होता था। राजा का चयन राजपुरोहित की सलाह से होता था। नयाय- दणड में वह राजा का निजी सलाहकार होता था। राजा को असतर - शतर. युद्धविद्या राजनीति राजय परषासन आदि की समपूरण षिकषा राजपुरोहित देता था। जैसे गुरू दरोणाचारय वषिषठ। समय -समय पर राजय के धारमिक उतसव व यजण आदि का आयोजन करवाता था। इसके लिए दूसरे पणडित वैदय दानादि करमकाण्डी बराहमण नियुकत करता था। अरथात धारमिक मामलों का परमुख मंतरी था। राजयाभिषेक आयोजन कर राजा का चयन करवाकर राजयाभिषेक करवाता सवयं के रकत से राजा का तिलक करता कमर में तलवार; बांधता; राजा को उचित उपदेष देता एवं उसकी कमर में परहार करके कहा कि राजा भी दणड़ से मुकत नहीं होता हैं। वह राजा का पथ परदरषक. दारषनिक षिकषक ़मितर के रूप में राजा को कदम-कदम पर कारयों में सहयोग करता था। वह युदधों में वह युदधों में राजा के साथ बराबर भाग लेता व जीत के लिए उतसाह ़परारथना आदि से सेना व राजा को उतसाहित करता। वह सवय भी युदध करता। वह एक वीर योदधा तथा समसत विषयों को षिकषक होता था। युदध के समय ़ सेना व शसतरादि तैयार करवाना शतरु की गतिविधियो का धयान रखना इतयादि राजपुरोहित के कारय थे। राजा तथा परजा व मनतरिमंडल में सौहारदधपूरण कारय करवाता था। राजपरिवार की सुरकषा.राजकुमार व राजकुमारियों के विवाहादि तथा राजय का काई आदेष. अधयादेष उसकी सहमती अथवा उसके दवारा होता था। राजपुरोहित एक राषटर निरमाता होता था। एक राजपुरोहित कभी भी करम से बराहमण नही रहा। वह मातर वंष से बराहमण हैं। यथा बराहमण राजपुरोहित अवषय रहा है। बराहमण के लिये राजन में कोई उततरदायितव नही होता चाहे राजयाधिपति कोई हो उसे अपने बराहमणवतव से सरोकार रहता था जबकि एक राजपुरोहित पर समपूरण राजय की जिममेवारी रहती थी। उसे प्रतिकषण राज्य प्रजा राजा व राजय परिवार की जिममेवारी रहती थी। उसे प्रतिकषण राज्य प्रजा राजा व राजय परिवार के बारे में चिनति रहना पडता था। पुरातन वैदिक काल में राजपुरोहित राजय् का मुखय पदाधिकारी व परमुख मंत्री होता था। नयाय करने में राजा के साथ उसकी भागीदारी होती थी। साधारण पुराहित. राजपुरोहित से सरवथा भिनन रहा। राजपुरोहित. राजयमंत्री षिक्षक. उपदेषक पथ – परदरषक होता था। धारमिक एवं राजनीतिक मामलों का परमुख होता था। वह राजा के साथ युद्ध भूमि में राजा को उचित सलाह एंव धैर्य देता था। वह सवय योद्धा एंव गोपनीय व्यक्ति होता था। वह पथ प्रदरषक दारषनिक एंव मितर के रूप में राजा का सहयोंग करता था। वह राजय की राजनीति में भाग लेता था। इस प्रकार उस समय राजपुरोहित दृ प्रतयेक राजय का सरवषरेषठ प्रभावषाली एंव महत्वपूरण व्यक्ति होता था। राजपुरोहित जाति वर्तमान राजस्थान के मारवाड, बीकानेर, जैसलमेंर, किशनगढ, सिरोही, बांसवाडा रियासतों में व मध्यप्रदेश की रतलाम, उज्जैन, सीतामउ रियासतों में तथा उतरी गुजरात के कुछ ईलाकों में काफी समय पूर्व से बसी हुई है। इस जाति का अतीत बहुत गौरवशाली है। प्राचीनकाल में जब राजा महाराजाओं का शासनकाल था तो सर्वश्रेष्ठ व कुलीन वेदपाठी ब्राह्मणों में से राजा महाराजाओं व अन्य शासकों द्वारा अपने राजपुरोहित का चयन किया जाता था। प्रारंभ में राजपुरोहित जाति नहीं होकर एक सर्वश्रेष्ठ व अत्यंत सम्मानित पद था। कालांतर में ब्राह्मणों में से जो जो अलग गौत्रों के राजपुरोहित थे उनमें परस्पर वैवाहिक संबंध होने लगे और बाद में राजपुरोहित का पद वंशानुगत हो गया और राजपुरोहित ने एक जाति का रूप ले लिया। राजपुरोहित राज्य के शासकीय, नैतिक, धार्मिक व न्यायिक क्षैत्रों में शासक का सर्वोच्च सलाहकार था। यहाॅ तक ही नहीं आवश्यकता पडने पर राजपुरोहित ने सैन्य संचालन भी बहुत ही बहादुरी व कुशलतापूर्वक किया। इस प्रकार यह जाति हमेशा जन्म से ब्राह्मण व कर्म से क्षत्रिय रही। शासकों द्वारा राजपुरोहितों को इनके शौर्य एवं वीरता के फलस्वरूप कई जागीरें बख्शी गई व कई तरह के सम्मान भी दिये गये। राजपुरोहित को अपने नाम के आगे ठाकुर व नाम के पीछे सिंह लगाने का भी अधिकार था एवं जागीरदार कहलाते है। राजपुरोहित परस्पर अभिवादन में जय श्री रघुनाथजी की करते हैं। राजपुरोहित समाज ब्रह्मोत्तर भी कहलाती है। इस जाति में सेवड, सोढा, जागरवाल, मनणा, दूदावत, उदेश, रायगुर, राजगुरू, रायथला, सांथुआ, गुंदेचा, मुथा आदि लगभग एक सौ से उपर उपजातियां है। इस जाति की सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिले क्रमशः बाडमेंर, पाली, जालोर, सिरोही, जोधपुर, बीकानेर व चुरू है। राजपुरोहित जाति का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। वैदिक काल व उतर वैदिक काल में वसिष्ठ, विश्वामित्र, बृहस्पति, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि ऋषियों ने राजपुरोहित पद को सुशोभित किया। परशुराम जी जैसे महान् ऋषि ने इसी जाति में जन्म लिया। महान् संत श्री खेतेश्वरजी दाता, शिक्षा सारथि स्वामी श्री आत्मानंदजी सरस्वती, स्वामी श्री मोहनानंदजी सरस्वती आदि ने इसी जाति में जन्म लेकर इस जाति को गौरवान्वित किया। आज भी इस जाति में कई महान् संत, महापुरूष, मनीषी व विचारक है। राजपुरोहित जाति के गौरवशाली अतीत को ध्यान में रखते हुये समाज सेवा व समाज सुधार हेतु यह वेबसाईट एक तुच्छ प्रयास है। समय समय पर आप सभी समाज बंधुओं, विचारकों एवं मनीषियों के सुझाव एवं सहयोग मिलता रहेगा ऐसी आपसे आशा है। अगर आपके पास हमारे समाज के बारे में उपयोगी जानकारी व सुझाव है तो आप हमे 9782288336 पर व्हाट्स अप्प कर सकते है |