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PALI (पाली )

श्री आत्मांनद जी महाराज के आदेश अनुसार ही पाली में भवन व छात्रावास का निर्माण हुआ हे , संत श्री ने आशीर्वाद देते हुए , समाज के दानदाताओ व भामाशाहों और समाज के कार्यकरता की 21 जनों की एक कमेठी बनाये गये , जो की मिल कर पाली में समाज भवन व छात्रावास निर्माण की जवाबदारी ले कर कार्य को अंजाम कर पंहुचा सके , समाज के शिक्षा प्रेमियों के सद्प्रयासो द्वारा ही बार - बार मंत्रणा कर संगठित होकर मूर्त रूप दिया गया सर्वप्रथम 12 सितम्बर 1971 को परिचय दिवस की शुरूआत की कार्यक्रम चलता रहा व हर वर्ष परिचय दिवस पर ही छात्रावास की चर्चा होती रहती । आखिर ऐसा आभास हुआ की बिना संतो की शरण में गये हमारी इस भावना को मूर्त नहीं दिया जा सकता तब संत श्री आत्मानंदजी महाराज को भी परिचय दिवस पर आमंत्रित कर निवेदन किया गया प्लोट पहले स्थानीय प्रयासों से प्राप्त हो गया था । परन्तु सभी की विचार धाराओं में समानता नहीं होने से संत श्री के शरणागत होना श्री ने भी एक कमेटी का मादजन्न बकरवाकर सर्वप्रथम आशीर्वाद के रूप में स्वयं की झोली से शुरूआत कर समाज प्रेमियों के सहयोग से आठ कमरें एवं एक हाल का निर्माण करवाया गया । दूर दराज से आये समाज बंधुओं के रात्रि हेतु भी यही एक स्थान था । साथ ही छात्रावास भी यही था । दोनो परिस्थितियों में संत श्री ने छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान देख एक विशाल भव्यतम छात्रावास की कल्पना की व समाज के बन्धुओं को अपने अन्तमन की बात कही । सभी ने सहमति जताते हुए संत श्री से निवेदन किया कि ये वश की बात नही हैं हम हमारी सामथ्र्यता के आधार पर समर्पित है । परन्तु नेतृत्व आपका ही रहेगा तो ये कार्य मूर्त रूप ले सकेगा संत श्री के मन में भी कई दिनो से कल्पना थी . व यहां पर भी संत श्री ने आशीर्वाद देते हुए समाज के भामाशाहो दानदाताओं एवं समाज सेवीयो के सहयोग से एक भव्य छात्रावास बनवाकर एक 21 सदस्यो का ट्रस्ट गठित करवाया गया जो सुव्यवस्थित ढंग से इस छात्रावास की समाज के शिक्षा प्रेमियों के सद्प्रयासो द्वारा ही बार - बार मंत्रणा कर संगठित होकर मूर्त रूप दिया गया सर्वप्रथम 12 सितम्बर 1971 को परिचय दिवस की शुरूआत की कार्यक्रम चलता रहा व हर वर्ष परिचय दिवस पर ही छात्रावास की चर्चा होती रहती । आखिर ऐसा आभास हुआ की बिना संतो की शरण में गये हमारी इस भावना को मूर्त नहीं दिया जा सकता तब संत श्री आत्मानंदजी महाराज को भी परिचय दिवस पर आमंत्रित कर निवेदन किया गया प्लोट पहले स्थानीय प्रयासों से प्राप्त हो गया था । परन्तु सभी की विचार धाराओं में समानता नहीं होने से संत श्री के शरणागत होना श्री ने भी एक कमेटी का मादजन्न बकरवाकर सर्वप्रथम आशीर्वाद के रूप में स्वयं की झोली से शुरूआत कर समाज प्रेमियों के सहयोग से आठ कमरें एवं एक हाल का निर्माण करवाया गया । दूर दराज से आये समाज बंधुओं के रात्रि हेतु भी यही एक स्थान था । साथ ही छात्रावास भी यही था । दोनो परिस्थितियों में संत श्री ने छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान देख एक विशाल भव्यतम छात्रावास की कल्पना की व समाज के बन्धुओं को अपने अन्तमन की बात कही । सभी ने सहमति जताते हुए संत श्री से निवेदन किया कि ये वश की बात नही हैं हम हमारी सामथ्र्यता के आधार पर समर्पित है । परन्तु नेतृत्व आपका ही रहेगा तो ये कार्य मूर्त रूप ले सकेगा संत श्री के मन में भी कई दिनो से कल्पना थी . व यहां पर भी संत श्री ने आशीर्वाद देते हुए समाज के भामाशाहो दानदाताओं एवं समाज सेवीयो के सहयोग से एक भव्य छात्रावास बनवाकर एक 21 सदस्यो का ट्रस्ट गठित करवाया गया जो सुव्यवस्थित ढंग से इस छात्रावास की

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