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Kesar singh ji (श्री केसर सिंह जी )

तत्कालीन मारवाड राज्य व अन्य देशी राज्यों में राजपुरोहित समाज में ऐसे ऐसे शूरवीर हुये है जिन्होंनें देशप्रेम व अपने राज्य को बचाने की खातिर बडे बडे युद्धों का नेतृत्व बतौर सेनापति स्वीकार कर असामान्य वीरता का परिचय देकर अपने प्राणों की आहुति देकर भी अपने राज्य की सेना को विजय श्री दिलवाकर हमारे समाज का नाम उॅचा किया.
आईये इसी कडी में आज हम स्मरण व नमन करते है अमर वीर शिरोमणि ठाकुर केशरीसिंहजी अखैराजोत का....... दलपतसिंहजी के अखैराजजी हुये. अखैराजजी मारवाड राज्य की सेना के सेनापति थे. अखैराजजी बाईस वर्ष की अल्पायु में ही वीरगति को प्राप्त हो गये थे. अखैराजजी की वीरगति के बाद मारवाड राज्य के सेनापति का ओहदा अखैराजजी के बेटे केशरीसिंहजी को दिया गया था।
अखैराजजी को जोधपुर स्टेट द्वारा आठ गाॅव जागीर में दिये गये थे ...
1. धुंधियाडी 2. खेडापा 3. भावंडा 4. भैंसेर कोटवाली 5. भैंसेर खुतडी 6. तिवरी 7. खींचन 8. जाटियावास. अखैराजजी के केशरीसिंहजी हुये। केशरीसिहजी को अपने पिता अखैराजजी से जागीर में दो गाॅव धुंधियाडी व खेडापा मिले. भावंडा गाॅव की जागीर केशरीसिंहजी के भाई को मिली. धुंधियाडी गाॅव 850 वर्ष पुराना है। धुंधियाडी गाॅव का नामकरण नेगडी आसोप के राजा उतानपाद के पुत्र ध्रुव जिन्होंने धुंधियाई में मोक्ष प्राप्त किया था उनके नाम से रखा गया था।
केशरीसिंहजी को जोधपुर महाराजा द्वारा देश निकाला भी दिया गया था। जोधपुर के महाराजा अभयसिंहजी व नागौर के राजा दोनो सगे भाई थे। जोधपुर के महाराजा ने नागौर हथियाने के लिए नागौर के राजा को मारने की साजिश रची तथा इसी साजिश के तहत जोधपुर के महाराजा ने नागौर के राजा को रातायता नाडा पर मीटिंग के लिए बुलाया और उनकी जाजम के नीचे बारूद बिछा दिया था लेकिन केशरीसिंहजी रात को अपनी सांड लेकर नागौर गये और नागौर के राजा को साजिश के बारे में बता दिया तथा उन्हे न आने की सलाह दी और सुबह होने से पहले ही जोधपुर आ गये। जब जोधपुर के महाराजा को इस बात का पता चला तो उन्होंनें केशरीसिंहजी को देश निकाला दे दिया। तब केशरीसिंहजी ने जोधपुर के महाराजा को कहा था कि मैंनें तो दो सगे भाईयों को आपस में लडने से बचाया है पर जब आपको मेरी जरूरत पडे तब आप मुझे जरूर याद करना।
उसके बाद जब जोधपुर के महाराजा ने अहमदाबाद पर आक्रमण किया तब केशरीसिंहजी को बुलावा भेजा तब केशरीसिहजी उनके सामने नहीं गये और उन्होंने महाराजा को समाचार भेजा कि अहमदाबाद में जीत हासिल करके ही आपका मुॅह देखेंगे। केशरीसिंहजी सीधे अहमदाबाद गये और मारवाड राज्य की सेना का नेतृत्व कर सेनापति के रूप में अतुल शौर्य व पराक्रम दिखाकर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गये। उनके अतुल शौर्य व वीरता के कारण मारवाड की सेना ने अहमदाबाद पर विजय प्राप्त कर ली थी। युद्ध में केशरीसिंहजी के शरीर पर बावन घाव लग गये थे और उनका सिर धड से अलग हो गया था। केशरीसिहजी की घोडी केशरीसिंहजी के सिर को महाराजा के शिविर में लेकर गयी थी।
केशरीसिंहजी को धंुधियाडी गाॅव में पितृ दादोसा के नाम से पूजा जाता है। केशरीसिंहजी का खेडापा गाॅव में मंदिर भी बना हुआ है। केशरीसिंहजी के वीरगति प्राप्त करने के बाद उनकी जागीर उनके दो बेटो में बॅट गयी। धुंधियाडी की जागीर उनके छोटे बेटे अनोपसिंहजी को मिली। अनोपसिंहजी ने धुंधियाडी में कोट बनवाया था।
कोटि कोटि नमन ठाकुर केशरीसिंहजी जैसे महान शूरवीरों को जिन्होंने राजपुरोहित समाज को ऐतिहासिक गौरव प्रदान कर समाज को सिर उॅचा कर चलने लायक बनाया।

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