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भगवान परशुराम

भगवान परशुराम विधा हत्या का बदला लेने , राजा साहसार्जुन के अत्याचारों को रोकने ताधा ब्राह्मणों के मानवीय जीवन को बचाने के लिए उदण्ड एख कर आततायी त्रियों का नाश करने के बाद राज्य का कार्यभार ग्राह्मणों को सौंप दिया मगर भगवान परशुराम द्वारा ऐसा करने पर राज्य की प्रशासनिक पूजा - अर्चना तथा तपस्या में व्यतीत होने लगा । अत : राज्य संचालन में बाधाएं आने पर महर्षियों की मंत्रणा से ब्रह्मार्षि वशिाह ने अपने तप से अर्वाचल पर्वत पर क्षत्रियों को उत्थान करने का निर्णय लिया । कहा जाता है
कि तब ब्रह्मार्षि वशिाह ने अधिक से चार राजकुमार उत्पन्न किये जो धौहान , परमार , सोलंकी तथा परिहार कहलाए । इन चारों क्षत्रिय राजकुमारों को सेवाओंश माना गया । ये चारों पुत्र बड़े ही तेजस्वी एवं ( पाराक्रमी थे । तत्पश्चात ब्रह्मार्षि वशिाह ने सोचा कि गुरु के बिना तो राजा असहाय और शक्तिहीन हो जायेगा । अत : उन्होंने उसी अप्रिकुड में अपने नाम की आहुति देकर एक ब्राह्माण को उत्पन्न किया । यह ब्राह्माणा शांत गुणी , विनम्राील , खेलों में पारंगत , दयाल एख वाहत सरल प्रकृति का धा , अत : ब्रह्मार्षि वशिष्ठ को लगा कि ये क्षत्रिय राजकुमार कहीं फिर से अन्याय न करने लग जाएं क्योंकि ब्राह्मण के रूप में जो गुरु होगा यह तो बात ही सरल स्वभाव का है । यही सोचकर ब्रह्मर्षि वशिा ने भगवान परशुराम का ध्यान करके अत्रिका में एक शाति और दी तब भयकर जाला के समान एक तेजस्वी ब्राह्मण पैदा हुआ ।
कहा जाता है कि इन कहा आप इन चारों जिब पत्रों की धुरीतिाई स्वीकार कर इन्हें गुरुमंत्र दो , तय पहले उत्पात हए ब्राह्माणा में तो राजपत्रों की पुरोहिताई स्वीकार कर ली जो राजगुरु कहलाए मगर दूसरे ब्राह्मण पुत्र जो भगवान परशुराम का अंश थाने इन राजपत्रों नहीं की पुताई स्वीकार की इसके बाज जागरवाल कहलाए । तब से लेकर आज तक राजपुरोहित समाज में राजा औिर जागरवाल गौत्री कहने का मतलब यह है कि आज राजपुरोहितों के पूर्वजों में अन्य ग्राह्यार्थियों के साध - साध भगवा परशुराम भी शामिल हैं । यहाथरस इस बात का भी करना चाहूंगा कि पाली के पाहोवाल ब्राह्माणों तथा भीनमाल के औसाली ब्राह्माण उद्वेगा वे भी राजपुरोहितों का सम्बन्ध रहा है ।

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