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जगराम सिंह राजपुरोहित

बीकानेर पर अधिकार करने के लिए जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने दो बार आढ़कमण किया था । पहले युद्ध की असफलता जोधपुर महाराजा के हृदय का कांटा बन चुकी थी । विक्रम सम्वत 1797 ( ई . सन 1740 ) में जायापुर महाराजा ने बीकानेर के विद्रोही ठाकुर लालसिंह ( भाद्रा ) . ठाकुर संग्राम सिंह ( चुरू ) तथा ठाकुर भीम सिंह ( महाजन ) के साथ पूंन बीकानेर पर चढ़ाई कर दी । सर्वप्रथम देशनोक पहच कर करणी जी के दर्शन किए और बीकानेर नगर में प्रवेश कर नगर वासियों को लूटा । जनजार की लूट का समाचार सुनकर बीकानेर कुतर गजसिंह काफी साथियों को लेकर जोधपुर ही सेना व विरोधियों का सामना करने के लिये आए परन्तु महाराजा जोरावर सिंह ने उन्हे गढ़ के औीतर बुला लिया । जोधपुर की सेनाआए परन्तु महाराजा जोरावर सिंह ने उन्हे मटके भीतर बुला लिया । जोधपुर की सेना लक्ष्मीनारायण जी के मन्दिर पास पुराने किले पर एक सेना अनूपसागर , दूसरा मोची उसी कुर की पूर्वी टाल पर तीसरा सोची दगल्या ( दगी साधुओं के अखाड़े का स्थान ) तथा दूसरी तरफ पीपाड़ के वृक्षों के नीचे तोपे , पैदल सिपाही आदि थे ।
सूर सागर पूर्ण रूप से आक्रमणकारियों के हाथ में एवाशिन्लाला या तालाब पर भी विद्रोहयों का अधिकार था । जाट के भीतर सेना महाराजा जोरावर सिंह की रक्षार्थी उपस्थित थी । उधर तोपों के गीलो की लगातार मार से ग्रट का बहुत नुकसान हो रहा था । मुख्यतः एक शशुबाण नाम की तोप तो क्षण - क्षण पर अपनी विकरालता का परिचय दे रही थी । राजकुमार गजसिंह ने शभुबाण के तिस्द साचीं किया अरि अपनी बन्दूकचियों को उस तोप को ध्वस्त करने का आदेश दे दिया । क्योंकि जोधपुर की तरफ से 8 सेर अर का , एक गीला करण महल के आगे के खम्भों में से एक खम्भे पर आकर टकराया । एक गोला सूरजपोल जाने अऔर पुरोहित जगराम जी में पहले से कुछ खटपट थी । कारों पर गिरा जिससे 8 - 10 सैनिक मारे गए । जब राजकुमार गजसिंह सूर्य को अर्क दे रहे थे तब एक गोला उनके महल पर आकर गिरा । दीवार की ईटे । राजकतनमार मर आ पड़ीं मुहता आनन्दमल जो कि महाराजा जोरावर सिंह के मुसाहिब थे । उनके और पुरोहित जाराम जी के पहले से कुछ रपटपट थी । मुत्ता आनन्दमल एक दिन जगाराम जी की तरफ इशारा करते हुए बोले - आप कहते थे कभी समय आने पर दो हाथ करके दिखा का अब माँका है दिख अपनी करामात पूरोहित जी ने इन व्यग्य भरे शब्दों की गांठ बांध ली और कुछ कर दिखाने की मन ही मन परिजा की ।
होली का दिन था । जोधपुर की फौज थेरा जाते हुए भी शामुबाण तोष बाण दान पर भीषण गोलाबारी कर रही थी , कुछ सैनिक होली का आनन्द ले रहे थ । पुरोहित जी ने महाराजा से गुत के पश्चात अपने कुछ विश्वासी सवारी के साथ शाम को शोर करते हुए एक साथ उन पर टूट पहा पहले ही हमले में शब्बाण तोप पर अधिकार जमा कर उसका मुहजोधपुर की सेना की ओर कर दिया । इस अप्रत्याशित हमले से जोधपुर की सेनाओं में बड़ी भयानक अव्यवस्था फैल गई । उसी क्षण जोधपुर महाराजा को खबर मिली कि जोधपुर पर जयपुर के महाराजा जयसिंह ने आक्रमण कर दिया अतः जोधपुर हक की आवारा हुई और नागौर पहच कर राहत की सांस ली । पोटिा जी ने भी साहस दिखाकर उनसे कुछ साथियों के साथ झड़ा रहे थे और खूब भगाया । इस गुप्त छापामार युद्ध मे जगाम जी का सारा शरीर वोटों से छलनी हो गया था । एक तीर उनके सीधा नाभि में लगा , पर नहीने एक ड्राटके से बाहर निकाला । का दिया पर ऐसा करने से उनके पेट की सात बाहर निकल आई फिर भी उस वीर ने कोई परवाह नहीं की । कमर कसकर शबु से हाहाता रहा और जब तक कि शबु सेना के भय से बीकानेर मुकत न कर दिया । !ि सेना की खदद कर जब बीकानेर पर कोई साकमणकारी आस - पास न रहा ता महाराजा जौरात ति ! जीत का सम रा सुनाने जाट में पहले महाराजा ने पुरोहित जी को गले लगाया और उसी क्षण इस सीर की आत्मा स्वर्ग की प्रयाण कर गई । महाराजा को बहुत दु : ख स्वामिभक्त का स्मारक ( डी ) मेरे महल में ही जहां उनके प्राण निकले है उसी स्थान पर बाद में यह निर्णय हालाकि यह स्मारक ऐसे स्थान पर बनाया जाए जहां से महाराजा पतिि से ही दौन कर सके । इसलिए यह स्मारक नानूह बुर्ज जूनागढ़ में स्थित है । स्मारक में पातांधता शिलालेखा मानसा हरनाथ सिह जी पुरोहित के पड़ जगराम जी का स्वागतास सम्वत 17 आचार एकन के दिन हुआ । जगराम जी के वीरगति प्राप्त करने पर गाव रासीसर उनके घर दाना जी को ।
जाराम जी का जन्म बीकानेर के पास गांव देसलसर में सम्वत् 1775 में हुआ था । पिता हरनाथ सिंह जी बड़े बहादुर व्यक्ति होने के साथ - साथ अच्छे घुड़सवार थे । इस कारण अच्छी घोड़े रखने में उनकी विशेष रुचि थी । एक बार बादशाह ने उन्हे घोड़े पर सवारी करते हुए देखा तो बादशाह को उनका ! घोड़ा पसन्द आ गया । हरनाथ सिंह जी ने तत्काल घोड़ा बादशाह की नजर कर दिया और उसकी एवज में बादशाह ने हरनाथ सिंह जी की देसलसर गांव और अपने प्रधान सलाहकारो में नियक्त कर फौज से बढ़ा । भोहटा दिया । अपने पिता के पद चिन्हों पर चलने के कारण जगराम जी बीकानेर रियासत के सेनापति रह ा इस तीर ने मात्र 12 वर्ष की युवावस्था में ही ऐसा रण कौशल दिखाया जो इतिहास के पन्नों में कित ! होकर अमिट ही नहीं बना बल्कि त्याग और बलिदान की याद दिलाने के लिए उनकी ताजी माता ही बीकानर , दी में माजिद है । बीकानेर का दादा कचा रखने में अनेक तीर अपना रण कौशल दिखाकर शहीद हुए लेकिन दुर्ग में स्मारक केवल इसी बीराजाराम जी ) का निर्मित हुआ अन्य का नहीं !

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