सेवङ

Sevad राजपुरोहित समुदाय के बारे में 40 प्रतिशत envelops जो Rajpurohits के प्रमुख subcaste / गोत्र में से एक है। वे Rathores की Rajpurohits कर रहे हैं और सभी Rathori अमेरिका (मारवाड़, बीकानेर, किशनगढ़, इदर {} हिम्मतनगर, रतलाम, झाबुआ, Sailan, सीतामऊ, अलीराजपुर। उनका Gotra भारद्वाज और कुलदेवी Bisotmata या Bishasthmata है खत्म हो गया है Jagirs दिए गए थे।
यह उनके पूर्वज राजपुरोहित Devpal देव कन्नौज से राव Sheoji राठौर के साथ मारवाड़ के क्षेत्र के लिए आया था कि कहा जाता है। कन्नौज फैसला सुनाया "Gahadvala" राजवंश के रूप में हमें करने के लिए जाना जाता है एक परिवार; उनकी सबसे प्रसिद्ध राजवंश राजा Jaichand, उनके अंतिम राजा था। Ghor.It मुहम्मद राव Sheoji 1272 samvatsari चारों ओर राजपुरोहित Devpal देव के साथ द्वारका के लिए तीर्थ यात्रा पर Jaichand की एक जीवित पोते, से मुलाकात की, कहा जाता है कि की Gahadvalas, 1194 ईस्वी में, आक्रमण से कन्नौज से विस्थापित हुए कुछ पालीवाल ब्राह्मणों पुष्कर में। पाली से परे मार्ग फारस, मध्य एशिया और मध्य-पूर्व और एन एक समृद्ध और समृद्ध व्यापार केंद्र था। यह स्थानीय ब्राह्मणों द्वारा नियंत्रित किया गया था। ब्राह्मणों पाली करने के लिए आते हैं और उन्हें परेशान करने के लिए और समय के लिए उन्हें समय लूटपाट कर रहे थे, जो स्थानीय जनजातीय लोगों और लूटने के बैंड, से छुटकारा पाने में मदद करने के लिए राव Sheoji का अनुरोध किया। राव Sheoji और उनके साथी पुरुष पहली और अंततः के रूप में अच्छी तरह से ब्राह्मणों से पाली को जीतने में सफल रहा आदिवासी प्रमुखों को पराजित किया। यह वर्तमान दिन मारवाड़ में Rathores की पहली विजय थी और Rathori राज के निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त किया। तब वे आज के बालोतरा के पास खेड़ और धीरे-धीरे स्थानीय राजपूत कुलों से समय पर विजय प्राप्त की मालानी क्षेत्र के साथ करने के लिए विस्तार किया।
राजपुरोहित Devpal देव जागीर के रूप में कई गांवों में दिया गया था। राज्य के लिए Rajpurohits द्वारा व्रत सेवा समय के दौरान राठौर राज्य से अधिक jagiri भूमि के साथ पुरस्कृत किया गया।
मुख्य Jagiri गांवों या Sevad rajpurohits का ठिकाना हैं: कनोडिया Purohitan, Desalsar Purohitan, Kalyanpura (चुरू) Thob (ओसियां), BARLI, Tinwari, Khichan, Kharabera Purohitan, Mehri Purohitan (सरदार शहर), Heyadesar (नोखा), Kisnasar (नोखा), Rasisar (बीकानेर), Mohrai, Tunkaliya, Dhandhora, Jatiawas, बड़ा खुर्द(जोधपुर) ckM+k [kqnZ Ghevda, Ghantiyala, Bavri (फलौदी), Chavandia, Bhavanda, Dhundhiyadi (नागौर), Talkia, Rupawas, Chadwas, Dodu (नागौर), Toliyasar, Borawar, कुचामन, Panchdoliya, Pachava, Maroot, Purohiton का बास Bikarlai, surayata आदि
कुलदेवी-बिसहसत माता यह जोधा तथा सूंडा राठोडो के पिरोयत है। इनका कथन है कि इनके पूरवज गौड बराहमण थे। इनके कथन के अनुसार इनके बडेरे देपाल कननोज से राव सियाजी के साथ आये थे। सियाजी ने इनको अपना पुरोहित बनाया और वे मारवाड़ के पिरोयतों में सगपण करके इस कौम में मील गये। मारवाड़ में ज्यों ज्यों राठौड़ों का राज बढता गया सेवड़ पिरोयतों को भी उसी तरह जयादा से जयादा शासन गांव मिलते रहे। आज क्या जमीन, क्या आमदनी और क्या जनसंख्या में सेवड़ पिरोयत कुल पिरोयतों से बढे हुये है। देपालजी से कई पुशत पीछे बसंतजी हुए। उनके दो बेटे बीजडजी और बाहडजी थे बीजडजी मलीनाथ जी के पास रहते थे। कंवर जगमाल जी ने उनको बीच में देकर अपने काका जेतमाल जी को सिवाने से बुलाया और दगा से मार डाला। बीजडजी इस बात से खेड छोडकर
बीरमजी के पास चले गये। राव चूंडाजी ने जब सम्वत् 1452 में मंडोर का राज लिया तो उनकी या उनके बेटे हरपाल को गेवां बागां और बडली वगैरा कई गांव मंडोर के पास-पास शान दिये। बाहडजी के कूकडजी के राजडजी हुए जिनकी औलाद के शासन गांव साकडिया और कोलू परगने षिव में है। हरपाल के पांच बेटे थे 1. र्दराजी इनके तीन
बेटे खीदाजी, खीडाजी और कानाजी थे। खींदाजी के खेताजी, खेताजी के रायमल, रायमल के पीथा जी जिसकी औलाद में शासन गांव बडली परगने जोधपुर है। रायमल का बेटा उदयसिंघ था। उसके दो बेटे कुंभाजी और भारमल हुए। कूम्भाजी की औलाद का शासन गांव खाराबेरा परगने जोधपुर में और भारमल की औलाद का शासन गांव धोलेरया परगने जालोर में है। खींडाजी की औलाद का शासन गांव टूकलिया परगने मेडता में है। कानाजी की औलाद में शासन गांव पाचलोडिया, चांवडया, परोतासणी और सिणया मेडता परगने के है। 2. दूसरा बेटा हरपाल का देदाजी, जिसकी औलाद के शासन गांव बावड़ी छोटी और बड़ी परगने फलोदी ओसिया का बड़ा बास और बाडा परगने जोधपुर है। 3. तीसरा दामाजी। ये राव रिडमलजी के साथ चितोड मंे रहते थे। जिस रात की सीसोदियों ने रावजी को मारा और राव जोधाजी वहां से भागे तो उनका चाचा भीभी चूंडावत ऐसी गहरी नींद में सोया हुआ था कि उसको जगा-जगा कर थक गये मगर उसने तो करवट भी नहीं बदली। लाचार उसको वही सोता हुआ छोड़ गये। दामाजी भी उनके पास रहा। दूसरे दिन सीसोदियों ने भीम को पकड़ कर कतल करना चाहा तो दामाजी ने कई लाख रूपये देने का ईकरार करके
उसको छुडा दिया और आप उसकी जगह कैद मे बैठ गये। कुछ दिनों पिछे जब सीसोदियों ने रूपये मांगे तो कह दिया कि मेरे पास इतने रूपये कहां। यह सुनकर सीसोदियों ने दामाजी को छोड़ दिया। जोधाजी ने इस बदंगी में चैत बद 15 सम्वत् 1518 के दिन गयाजी में बहुत बड़ा शासन दिया जिसकी आमदनी दस हजार र्पये से कम नहीं थी। दामाजी के जानषीन तिंवरी के पुरोहितजी कहलाये है। गांव तिंवरी जोधपुर परगने के बड़े-बड़े गांवों में से एक नामी गांव नौ कोस की तरफ है। दामाजी पिरोयतों में बहुत नामी हुए हैं और उनकी औलाद भी बहुत फैली कि एक लाख दमाणी कहे जाते है। यानि एक लाख मर्द औरत बीकानेर, मारवाड़, ईडर, किषनगढ और रतलाम वगैरा राठोड रियासतों में सन् 1891 तक थे। इनके फैलाव की हद उत्तर की तरफ गांव नेरी ईलाके बीकानेर जाकर खतम होती है
दामाजी के छः बेटे थे 1. नाडाजी (ना औलाद) जिनसे जोधपुर के पास नाडेलाव तालाब बनाया। 2. बीसाजी। इनहोने बीसोलाव तालाब खुदाया था। इसका बेटा कुंपाजी और कूंपाजी के तीन बेटे केसूजी, भोजाजी और मूलराज जी। केसोजी की औलाद में शासन
गांव घटयाला परगने शेरगढ है। भोजाजी की औलाद में शासन गांव तालकिया परगना जेतारण है। मूलराज जी ने मूलनायक जी का मनदिर जोधपुर में और एक बड़ा केाट गांव भैसेर में बनवाया जिससे वह भैसेर कोटवाली कहलाता है। इनके बेटे पदम जी के कल्याणसिंघ जी जिन्होने तिंवरी में रहना माना। इनके बड़े बेटे रामसिंघ, उनके मनोहरदास, उनके दलपतजी थे। ये वैशाख बद 9 सम्वत 1714 को उज्जैन की लडाई में काम आये जो शहजादे औरंगजेब और महाराजा शूरी जसवंत सिंघजी में हुई थी। दलपतजी के अखेराज महाराजा शूरी अजीतसिंजी के तरिके में हाजिर रहे। अखेराज के सूरजमल, उनके रूपसिंघ उनके कलयाणसिंघ उनके महासिंघ (खोले आये) महासिंघ के दौलतसिंघ, दौलतसिंघ के गुमानसिंघ जो आसोद सुदी 8 सं. 1872 को आयस देवनाथ जी के साथ किले जोधपुर में नवाब मीरखांजी के आदमियों के हाथ से काम आये, उनके नतथूसिंघ, उनके अनाड़सिंघ उनके भैरूसिंघ उनके हणमतसिंघ जो अब तिवरी के पिरोयत है। इनका जनम सं. 1923 का है। दूसरे बेटे अखेराज के केसरीसिंघ जो अहमदाबा की लडाई में काम आये। इनके दो बेटे परतापसिंह अनोपसिंह थे। परतापसिंह की औलाद का शासन गांव
खेडापा परगने जोधपुर है जहां रामसनेही का गुरदवारा है। अनोपसिंह की औलाद का शासन गांव दनयाडी परगने नागौर है। तीसरे बेटे अखेराज के जयसिंघ की औलाद का शासन गांव जाटियावास परगने बीलाडा है। चैथे बेटे महासिंघ के चार बेटे सूरतसिंह, संगरामसिंह, लालसिंह, चैनसिंह की औलाद का शासन गांव खीचोद परगना फलोदी है। पांचवे बेटे वजियराज के बडे़ बेटे सरदार सघि की औलाद का शासन भैसेर कोटवाली दूसरे बेटे राजसिंह की औलाद का भैसेर कूतरी परगने जोधपुर तीसरे और चैथे बेटे जीवराज और बिषन सिंह की औलाद का आधा-आधा गांव भाडवा परगने नागौर शासन है। छटा बेटा महासिंघ का तेजसिंह सूरजमल के खोले गया, सातवें बेटे फतहसिंघ का छटा बंट गांव भाडवा में है। कल्याणसिंह के दूसरे बेटे गोयंददास जी औलाद का शासन गांव ढडोरा परगने जोधपुर और तीसरे बेटे रायभान की औलाद का शासन गांव भटनोका परगने नागौर है। मूलराज के दूसरे बेटे महेसदास की औलाद का शासन गांव चाड़वास परगने सोजनत में है तीसरी बेटे छताजी की औलाद का शासन गांव धूडयासणी परगने सोजत में है। चैथे रायसल का मालपुरया परगने जेतारण परगने परगने में है छोटे भानीदास का गांव भोजासर बीकानेर में है।
3. तीसरा बेटा दादाजी का ऊदाजी जिसकी औलाद का शासन गांव बिगवी और थोब परगने जोधपुर में है। 4. चैथा बेटा दामाजी का बिजजाजी जिसकी औंलाद में शासन गांव घेवडा परगने जोधपुर. रूपावास परगने सोजत और मोराई परगने जैतारण हैं 5. दामाजी का पांचवा पुतर पिरोयत यह जोधपुर के राव जोधाजी के कंवर बीकाजी के साथ 01 अक्टूबर 1468 को जोधपुर (बीकानेर ) नये राजय को जीतने के रवाना हुए इनका वंष अपनी वीरता एवं शारय के लिय रियासत बीकानेर के सतमभ रहे और इनको पटटे में मिले गांव इस रियासत में हैं। विक्ररमसी का पुतर देवीदास 29 जून 1526 को जैसलमेर में सिंध के नवाब से युदध करते हुए वीर गति परापत हुए इनको इस वीरता एंव जैसलमेर पर अधिकार करने के फलसवरूप गांव तोलियासर एवं 12 अनय गांव पटटे में मिले एंव पुरोहिताई पदवी मिली। देवीदास के पुतर लकषमीदास 12 मारच 1542 को जोधपुर के राव मालदेव के बीच युदध में काम आये बडे पुतर किषनदास को उनकी वीरता के लिए थोरी खेड़ा गांव पटटे में मिला जिनके पोते मनोहर दास ने इस गांव का नाम
किसनासर रखा। किसनदास के पुतर हरिदास ने हियादेसर बसाया। सूरसिंह के गद्दी पर बैठने के बाद तोलियासर के पुरोहित मान महेष की जागीर जब्त करली इसके विरोध में मान महेष ने गढ़ के समाने अग्नि में आत्मदाह कर लिया जहां अब सूरसागर है इसके बाद से तोलियासर के पुरोहितों से पुरोहिताई पदवी निकल गई लगभग 1613 में यह पदवी कल्याणपुर के पुरोहितों को मिली। हरिदास के लिखमीदास व इनके गोपालदास व इनके पसूराम जी हुए इनके पुतर कानजी को आठ गांव संवाई बडी, कल्याणपुर, आडसर, धीरदेसर, कोटडी, रासीसर, दैसलसर और साजनसर पट्टे में मिले इनके सात पुत्रों का वंष अब भी इन गांवों में है। बीकानेर राज्य के इतिहास में सन् 1739 में जगराम जी, सन् 1753 में रणछोड दास जी, सन् 1756 में जगरूप जी, सन् 1768 में ज्त्रान जी, सन् 1807 में जवान जी, सन् 1816 में जेठमल जी, सन् 1818 में गंगारामजी व सन् 1855 में परेमजी व चिमनराम का जीवन वीरता एवं शौर्य के लिए परसिद्ध रहा है। कल्याणपुर के टिकाई पुरोहित षिवनाथसिंह जी के इन्तकाल में बाद पुतर भैरूसिंह जी की रियासत से नाराजगी के बाद से यह पदवी कोटडी गांव के पुरोहित हमीरसिंहजी को मिली। इसके बाद इनके बडे पुतर मोतीसिंहजी व उसके बाद स्व. मोतीसिंह जी के बडे पुत्र श्री भंवरसिंह टिकाई है। 6. दादोजी का छटा पुत्र देवनदास जिसके बडे बेटे फल्लाजी का शासन गांव नहरवा दूसरे बेटे रामदेव का पापासणी परगने जोधपुर में है
फल्ला ने फल्लूसर तलाब बनाया जिसको फज्जूसर भी कहते है। मारवाड़ एवं थली के अलावा किषनगढ़, ईडर, अहमदनगर और रतलाम वगैरा राठोड रियासतों में भी सेवड़ पिरोयतों के शासन गांव है। सेवड़ों की तीन खांपे हैं 1. अखराजोत 2. मालावत 3. कानोत अखराजोत वंष के पास जोधपुर जिले के तिंवरी ग्राम में आठ कोटडियां है। मालावतों के पास पाली, सोजत और जेतारण में गांव है कानोतों के गांव थली में है।
कुलदेवी-बिसहसत माता यह जोधा तथा सूंडा राठोडो के पिरोयत है। इनका कथन है कि इनके पूरवज गौड बराहमण थे। इनके कथन के अनुसार इनके बडेरे देपाल कननोज से राव सियाजी के साथ आये थे। सियाजी ने इनको अपना पुरोहित बनाया और वे मारवाड़ के पिरोयतों में सगपण करके इस कौम में मील गये। मारवाड़ में ज्यों ज्यों राठौड़ों का राज बढता गया सेवड़ पिरोयतों को भी उसी तरह जयादा से जयादा शासन गांव मिलते रहे। आज क्या जमीन, क्या आमदनी और क्या जनसंख्या में सेवड़ पिरोयत कुल पिरोयतों से बढे हुये है। देपालजी से कई पुशत पीछे बसंतजी हुए। उनके दो बेटे बीजडजी और बाहडजी थे बीजडजी मलीनाथ जी के पास रहते थे। कंवर जगमाल जी ने उनको बीच में देकर अपने काका जेतमाल जी को सिवाने से बुलाया और दगा से मार डाला। बीजडजी इस बात से खेड छोडकर बीरमजी के पास चले गये। राव चूंडाजी ने जब सम्वत् 1452 में मंडोर का राज लिया तो उनकी या उनके बेटे हरपाल को गेवां बागां और बडली वगैरा कई गांव मंडोर के पास-पास शान दिये। बाहडजी के कूकडजी के राजडजी हुए जिनकी औलाद के शासन गांव साकडिया और कोलू परगने षिव में है। हरपाल के पांच बेटे थे
1. र्दराजी इनके तीन बेटे खीदाजी, खीडाजी और कानाजी थे। खींदाजी के खेताजी, खेताजी के रायमल, रायमल के पीथा जी जिसकी औलाद में शासन गांव बडली परगने जोधपुर है। रायमल का बेटा उदयसिंघ था। उसके दो बेटे कुंभाजी और भारमल हुए। कूम्भाजी की औलाद का शासन गांव खाराबेरा परगने जोधपुर में और भारमल की औलाद का शासन गांव धोलेरया परगने जालोर में है। खींडाजी की औलाद का शासन गांव टूकलिया परगने मेडता में है। कानाजी की औलाद में शासन गांव पाचलोडिया, चांवडया, परोतासणी और सिणया मेडता परगने के है। 2. दूसरा बेटा हरपाल का देदाजी, जिसकी औलाद के शासन गांव बावड़ी छोटी और बड़ी परगने फलोदी ओसिया का बड़ा बास और बाडा परगने जोधपुर है। 3. तीसरा दामाजी। ये राव रिडमलजी के साथ चितोड मंे रहते थे। जिस रात की सीसोदियों ने रावजी को मारा और राव जोधाजी वहां से भागे तो उनका चाचा भीभी चूंडावत ऐसी गहरी नींद में सोया हुआ था कि उसको जगा-जगा कर थक गये मगर उसने तो करवट भी नहीं बदली। लाचार उसको वही सोता हुआ छोड़ गये। दामाजी भी उनके पास रहा। दूसरे दिन सीसोदियों ने भीम को पकड़ कर कतल करना चाहा तो दामाजी ने कई लाख रूपये देने का ईकरार करके उसको छुडा दिया और आप उसकी जगह कैद मे बैठ गये। कुछ दिनों पिछे जब सीसोदियों ने रूपये मांगे तो कह दिया कि मेरे पास इतने रूपये कहां। यह सुनकर सीसोदियों ने दामाजी को छोड़ दिया। जोधाजी ने इस बदंगी में चैत बद 15 सम्वत् 1518 के दिन गयाजी में बहुत बड़ा शासन दिया जिसकी आमदनी दस हजार र्पये से कम नहीं थी। दामाजी के जानषीन तिंवरी के पुरोहितजी कहलाये है। गांव तिंवरी जोधपुर परगने के बड़े-बड़े गांवों में से एक नामी गांव नौ कोस की तरफ है। दामाजी पि

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