उदेच

मरीचि ब्रह्माजी के मानस पुत्र है व मरीचि के मन से प्रजापति कश्यप का प्रादुर्भाव हुआ । दक्ष के बीर्य और प्रसुति के गर्भ से साठ 60 कन्याओं का जन्म हुआ उनमें से 8 कन्याए धर्म को ,
11 रूद्रो को , 1 कन्या ( सती ) भगवान शिव को तेरह कन्याए कश्यप को तथा सताइस कन्याएं चन्द्रमा को अर्पित कर दी कश्यप कि पत्नियों के नाम ( ) देवमाता अदिति ( 2 ) दैत्यमाता दिति ( 3 ) सर्पमाता कन्दु ( 4 ) पक्षियों की माता विनता ( ) गौऊओं - भैसो की माता सुरभि ( 6 ) सारमेय ( कुत्ता ) आदि जन्तुओं की माता सरमा ( 7 ) दानवजनी दनु तथा अन्य पत्नियां अन्याय संतानों की जननी हैं ।
विनता के दो पुत्र हुए अरूण और गरूड , दोनो ही विष्णु तुल्य पराक्रमी थे । उन्हीं दोनो से सारी पक्षी जातियां प्रकट हुई ( संक्षिप्त ब्रह्मवैर्कत पुराणाक पृष्ठ सं 36 ) अरूण के पुत्र आरूणि हुए व इन्हें महर्षि धौम्य के आश्रम शिक्षा हेतु भेजा गया गुरू हमेशा शिक्षा के साथ साथ परिक्षाएं भी लेते रहते थे । इसी सन्दर्भ में एक बार आरूणी को खेत की मेड ठीक करने के लिए भेजा क्योंकि वर्षा के समय खेत की मेड ( ओोरा ) एक जगह से क्षतिग्रस्त हो गई थी । और जल का वेग बाधने के लिए रखी मिट्टी को बहा ले जाता था । निष्फल लोट जाना आरूणी जैसे शिष्य को स्वीकार नहीं । वह स्वयं टूटी मेड के स्थान पर लेट गया । जल का वेग रोक कर शरीर शीतल हुआ , अकडा वेदना का पार नहीं ! किन्तु आरूणी उठ जाए और गुरुदेव के खेत का जल बह जाने दे यह नहीं हुआ ।
गुरुदेव के यहां रात्रि में आरूणी नही पहुंचा तो वे चिन्तित हुए इंडने निकालने और उनकी पुकार पर आरूणी उठा उसकी गुरू भक्ति से प्रसन्न गुरु के आशीर्वाद ने उसी दिन से उसे आरूणी से महर्षि उद्दालक बना लिया । इनके एक पुत्र ! हवेतकेतु नाम का हुआ गुरु कृपा बल से विद्या प्राप्त कर उसको विद्या का घमण्ड हो गया कि मैं सर्वोपरि विद्वान और बुद्धिमान हैं । तब उद्दालक महर्षि ( आरूणी ) उस पर क्रोध नहीं करके उससे पूछा श्वेतकेतो ! तूने ऐसी कौनसी विद्या पड़ी हैं । जिससे तू अपने आपको सबसे बडा पडित समझता हैं । और इतना अभिमान में भा । गया हैं । विद्या का स्वरूप तो विनय से निखरता हैं । अभिमानी पुरूष के सारे गुण तो दूर चले जाते हैं और समस्त दोष अपने आप उसमें आ जाते हैं । तूने अपने गुरूओं से यह सीखा हैं , तो बता कि ऐसी कौनसी वस्तु है जिसे एक की सुनने से बिना सुनी हुई सब वस्तुएं सुनी जाती है । जिसे एक को विचार से बिना विचार की हुई सब वस्तुओं का विचार हो जाता हैं । उऔर जिसे एक को ज्ञान से नहीं जानी हुई सब वस्तुओं का ज्ञान होता हैं । श्वेत केतु का गर्व चकनाचूर हो गया उसने सोचा की मैं तो ऐसी किसी वस्तु को नहीं जानता मेरा अभिमान मिशया है व न होकर विनय के साथ पिता को चारागों पर गिरी ! पडा क्षमा याचना मागने पर उसे तत्वमसि ( सत तू ही हैं ) पर विस्तार से उदाहरण द देकर ब्रह्माज्ञान की प्राप्ति करवा दी । इनकी जो दशा वाला उहालक वाशीय गी ! कहलाये धीरे - हीरे कालान्तर में उदेश कहलाने लगे । छिान्दोग्योपनिषद ) मह!ि उद्दालक को भी गौत्र प्रवर्तक ऋषियों में गणना होती हैं । 1 . उद्देश - उदालधिक जटि को वशज उदेश कहलाए

इस जाति / गौत्र का इतिहास / विवरण हमारे पास उपलब्ध नही हैं | अगर आपके पास हो तो कृपया हमें 9782288336 नंबर पर व्हाट्स अप्प करें | धन्यवाद्

Back