बोरा

एक बार सिरोही क्षेत्र में भयंकर अकाल पडा तब मादाजी के वंश में एक राजगुरु हुए ( जिसके नाम में जगह जगह भ्रान्तिया है, परन्तु घटना की जानकारी से सभी सहमती जताते है | परन्तु है जनश्रुति के आधार पर जिसकी बुजुर्ग पीढी व मुड्तरा सिल्ली के रावजी भी इसकी पुष्टि करते है |) जिनका ऐसा प्रण था | जरण, मरण ,परण एवं अचानक विपदा पर किसी को अपने द्वार से खाली नही भेजते थे | यथासंभव अगले की जरूरत देख कर अपने मार्केंडश्वर के इष्ट बल द्वारा उसे आर्थिक सहायता करते थे | ये बात फेलते फेलते राजा के पास पहुची, सभी सेठ साहूकार भी आश्चर्य चकित थे की इतना धन इनके पास आया कहा से ! परन्तु इनकी धेर्यता एवं तपस्या के तेज के आगे इनके मुहं पर किसी के कहने की हिम्मत नही होती थी | कुछ मंत्रियो ने राजा के साथ मन्त्रणा कर राजा को वेश बदलकर जाकर सहायता मांगने को खा, राजा भी काफी दिनों से इन घटनाओ को सुन रहा था एवं समय के इंतजार में था क्योकि दूतो द्वारा गुप्तचर रिपोर्ट मांगी गई | परन्तु राजा विश्वास नही मानता ठा एवं स्वयं राजगुरु के द्वार पर सहायता लेने जनता को राहत दिलाने के लिए पंहुचा | राजा के वेश बदलने के बावजूद राजगुरु ने सीधा सम्बोधन किया | आओ राजन ! मेरे अहो भाग्य की आप मेरे यहा पधारे, कहिये मै आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ? तब नत मस्तक होकर पुरे राज्य के बारे में भीषण अकाल के बारे में सभी स्तिथि से अवगत कराकर प्रार्थना की कि आपसे काफी अपेक्षा लेकर आया हूँ | निराश मत लोटाना अत: खाली हाथ मत लोटाना तब राजगुरु राजपुरोहितजी ने सोने की मुद्राएँ व चांदी के सिक्के राजमुद्रा से प्रमाणित थेलिया घर के अन्दर से ला लाकर राजन को देनी शुरू की, इतना धन दिया कि राजा को कही भी दुसरे पड़ोसी राजा से अनुनय विनय नही करनी पड़ी | इस जाति / गौत्र का इतिहास / विवरण अगर आपके पास हो तो कृपया हमें 9782288336 नंबर पर व्हाट्स अप्प कर सकते है | धन्यवाद्

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