दुदावत

दुदावत - दुदावत राजपुरोहित सभी दुदाजी जोशी के वंशज है , . | इनके विर भीनमाल नगरी से भ्रमण करते करते जहां जहां भी बसे अपने पूर्वज दूदाजी के पर ही दूदावत कहलाये , ऐसा राव समाज व समाज के इने - गिने बुर्जुग ली स्वीकार करते हैं । दूदावत व दूदातर एक ही शब्द के अपभ्रंश है । हमने इनकै । की जन्मभूमि के बारे में थोडी जानकारी प्राप्त की । उसके अनुसार ये भीनमाल नगर से निकले हुए उच्च कोटि के ब्राह्मण जो ज्योतिष विद्या में पारगंत थे । इनके पूर्वज | की राजघराने में बडी मान्यता रही । समय बदलता गया । ज्योतिष विद्या क ा । की कमी होती गई । भीनमाल का समय के साथ नाम भी बदलता गया । सर्वप्रथम श्रीमान पुष्पमाल , भीलमाल , भीनमाल व वर्तमान में भीनमाल । गौतम ऋषि की पाढ़ तपोभूमि , भीनमाल नगर पूर्व काल में विश्व श्रुत विशाल व वैभव सम्पन्न नगर था ! उस काल में श्रीमाल , नग्र नाम से विख्यात तथा गुर्जर प्रान्त की राजधानी थी । . महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की मातृभूमि के इतिहास का साक्षी रूप श्रीमाल पुराण विक्रम संवत् 13 वीं सदी के पूर्वाद्ध की रचना प्रतीत होती है । यह पच्चहत अध्याय व सैकडों श्लोको में रचित स्कद पुराण का एक भाग ( 10 / 11 ) मात्र ! श्री अर्थात भगवती लक्ष्मी से विस्थापित इस नगर की स्थापना का आदिकाल त्रेयम्बकाश्रम पधारें गौतमादि पैतालिस हजार ब्राह्मणों से प्रारम्भ होता है । सत्यवादी हरिश्चन्द्र से पूर्व मान्यता राजा का श्रीमाल पुराण बात की पुष्टि करता हैं कि इस नगर का इतिहास अति पुराना हैं । श्री माता में उल्लेख होना इस के अनुसार लक्ष्मी के विवाह के अवसर पर ही श्रीमाल नगर की नींव पड़ी । पुर . - लेखक महीना नक्षत्र व तिथि लिखी है किन्तु संवत् का उल्ला किया । अपने स्थापना काल से ही गौतम ऋषि के ब्रह्मलीन एवं लक्ष्मी के कोषायमान हो जाने से श्रीमाल नगर * माल नगर की कई उतार - चढ़ाव देखने पर | श्री विघटन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई । संभवत : इस ( सिध सौवीर के निवासी ब्राह्मणों ने जो स्थापना के समय ही कर चले वे पुनः अपने प्रदेश चले गये थे । अन्य लुटेरी जातियों के साथ मिलकर बदला गीतों अनुसार लेने हेतु श्रीमाल नगर पर आक्रमण किया । क्षेत्रिय लोक के इस आक्रमण का नेतृत्व किसी नारी ने किया था । नाम स्पष्ट नहीं होने से नाम से सम्बोधित नहीं किया गया ) लोकोक्तियों द जनश्रुतियों के आधार पर ही सारी का नाम की राक्षसी के उपद्रवों का दर्णन भी इसी संदर्भ में आता है । यह ना नगर बसने के लगभग एक शब्ाादी के बाद हुई मानी जाती है । जिसमें यहा निवासी श्रीमाली ब्राह्माण अबूंद व सौगाधिक ( मुख्य ) पर्वतदि को चले गये । इस आगमग 150 वर्ष पश्चात श्रीपुज राज के आष्वासन पर अधिकांश लोग श्रीमाल नगर नोट आये और नगर प्राचीन शुद्ध आर्य संस्कृति की अक्षुण्यता बनाये रखने की ओर समय अग्रसर हुआ । चापवशीय ( चावडा ) राजा व्याधनुख के राज्यकाल में विक्रम स 69 । प्रसिद्ध ग्रन्थों ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त एवं खुण्डवाद्य की रचना करने जाने खगोल । ज्योतिष शास्त्र रचियता विद्वान ब्रह्मगुप्त श्रीमाल नगर के अनमोल रत्न थे । इनका जन्म वि स 656 माना जाता है । यह नगर विस 834 तक गुजर प्रान्त की राजधानी रहा । उस दौरान राजा भोज ने श्रीदत के पुत्र महाकवि माघ के निमन्त्रण पर यहा । की यात्रा की और राजा भोज की आज्ञा से यहां संजिल का सूर्य मन्दिर बनाया । गया । जिसके अवशेष आज भी स्थानीय वाराहश्यामजी के मन्दिर में है । तथा शिलालेख महालक्ष्मी के मन्दिर में लगा हुआ है । उस समय श्री माल नगर ! योजन लम्बा तथा 13 यौजन धौडा था । ( एक योजन - 8 मील का होता है ) जिस में दस द्वार थे ।
पुराणों के अनुसार यहां 1 हजार गणपति 4 हजार क्षेत्रपाल , ta चण्डिका देवी , 90 बावडियां 11 हजार शिवलिंग , एक हजार मुख्य देवालय एवं 18 हजार दुर्गा मन्दिर थे । यह अस्सी हजार ब्रह्माशालाएं हैं हजार दुकाने एक हजार नृत् शालाएं व एक लाख छियासठ हजार श्रीमन्त ब्राह्मणों की नगरी थी । इस सुन्दर नगर के चारो ओर परकोटा था । जिसमें चौरासी दरवाजे थे व तक्षशिला की तरह य भी अपने आप में विद्या का प्रमुख केन्द्र था । श्रीमाल नगर का द्वितीय विघटन मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप 12009 में हुआ वि ा श्रीमन्त ब्राह्माणों की पाली नगरी को वि ा 1190 के लुटने के बाद इसर नगर छोडने को विवश | मन्तों की नगरी भीनमाल ही थी । यहां के ब्राह्मण पुन हुये । जहा चालुक्य राजा उस समय ब्राह्मण भक्त तथा बहुत ही शूरवीर था ।
जिसने मुसलमानों की सेनाओं को अपनी सरहद पर आने ही नहीं दिया । विस , . . । राव सिहा का पाली के शासक यशोधरजी उर्फ राजमलजी द्वारा निमन्त्रण पर पाली पहुंचकर ( वर्तमान गांव विटू के लक्ष्मीनारायण मन्दिर पर एक शिलालेख वर्तमान में भी मौजूद है । ) वि सं . 1256 के लगभग जोधपुर राठौड वंश राव सिह ने यदनी से | श्रीमाल नगर का पुन उद्धार कर ब्राह्मणों को पुन : आमन्त्रित किया । लेकिन पहले वाली स्थिति न बन सकी । उपरोक्त विवरण इसलिए दर्शाया गया कि यह मात्र कपोलकल्पित नहीं है अपितु कोई भी जिज्ञासु खण्डहर भग्नावेश , सूर्य मन्दिर द शिलालेखों द्वारा उपरोक्त जानकारी के प्रति सतुष्ट हो सकता है । निश्चय ही इस | समाज के पूर्वज तपस्वी के साथ शौर्यशाली रहे व माताएं भी वीरमाताएं थी । जिसके उदाहरण रूप में गांव - गांव में सतीयों व झुंझारों के स्थान की पूजा अर्चना राजपुरोहित क्या दूसरे समाज भी नतमस्तक होकर मन्नोति मांगते हुए देखे जाते है । आज भी कई जगह उन सतीयों का श्राप का असर विद्यमान है । सैकडों वर्ष बीत | जाने पर भी उनके वंशज वहां का पानी तक नही पीते है । शौर्यगाथाओं के ज्वलंत उदाहरण कई जगह देखे व सुने जा सकते है ।
इस जाति / गौत्र का इतिहास / विवरण हमारे पास उपलब्ध नही हैं | अगर आपके पास हो तो कृपया हमें 9782288336 नंबर पर व्हाट्स अप्प करें | धन्यवाद्

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