भंवरिया

ये आदगोड बराहमणों से निकले है पूरवकाल में यह रावलोत भाटी राजपूतों के पुरोहित थे जब देराबर का राज भाटियों से छूटा तो इनकी पिरोताई भी जाती रही। इनका शासन गंाव कालोट परगना मालनी में है। राजपरोहित को समय-समय पर उनके सौरयपूरण कारय एवं बलिदान के एवज में सममानित किया जाता था जिनका विवरण इस परकार हैं 1.बांह पसाव, 2.हाथ रौ कुरब, 3.उठण रौ कुरब, 4.बैठण रौ कुरब, 5.पालकी, 6.मय सवारी सिरै डोढी जावण रौ, 7.खिड़किया पाग, 8.डावो लपेटो, 9.दोवड़ी ताजीम, 10.पतर में सोनो, 11.ठाकुर कह बतलावण रौ कुरब दरबार में राजपरोहित के बैठने का स्थान छठा था। साथवां स्थान चारण का था। ये दोनो दोवड़ी, ताजीमी सरदारो ओहदेदार गिने जाते थे। राजपरोहित के दरबार में आने-जाने पर महाराज दरबार एवं गुरू पदवी दोनो तरीको से अभविादन मिलना होता। ये भी राजगुरु है इनके बाड़मेर जिले में ही सिणधारी में 5 घर, महाबार में 3 घर इत्यादी | परन्तु बुजुर्गो का मानना है की हम राजगुरु ही है |

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