सिरवाडा

डीसा के राव श्रीकांतिलालजी रतनाजी एवं रुपाजी मादाजी के द्वारा विस्तर्त चर्चा पर निर्णय ( चोपडो के अनुसार ) लिया की वास्तव में ये राजगुरु है | एवं सिरवाडा गाव के पीछे इन्होने अपनी मुल जाती छोड़ गाव को जाती मान लिया | ( रावजी कहते है इसमे हमारा दोष नही है यजमान समर्थ है, इनको बार बार कहने पर भी स्वयं को सिरवाडा ही कहते है | ) उपरोक्त सभी राजगुरु है व वशिष्ठ ऋषि के वंशज मानते है | ( उद्गम स्थल अनलकुंड अर्बुद्पर्वत ( माउन्ट आबू ) वशिष्ठाश्रम है | ) परन्तु जागरवाल चाहे भ्रमण करते करते कही भी जाकर बसे उन्होंने किसी तरह की अटक को नही पकड़ी | चाहे सिरोही हो या जालोर , पाली , बीकानेर इत्यादी | रहन सहन व रीती रिवाजो में वहा के वातावरण में घुल मिल गये | वेसे भी हर 40 किलोमीटर पर भाषा के लहजे में अथवा संस्क्रती में थोडा बहुत फर्क आता ही है |

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