राजगुरू

रायगुरू जाति की उत्पत्ति श्री वशिष्ठ महर्षि द्वारा अनलकुण्ड से चारों राजपुत्रों की उत्पति व साथ में शजगरू की उत्पति के पश्चात राजपुत्र अलग - अलग भाग में शासन व्यवस्था संभालने लगे । परन्तु उनके चारों राजपुत्रों के ) उस समय राजगुरू राजपुरोहित रहे बाद में ज्यों ज्यों वश बढा त्यों त्यो गुरू वंश भी बढा । कालान्तर में राजवंश बढ़ता गया तो राज्य सीमा भी बंटवारे के आधार पर सिमटती गई । ऐसे ही चौहान ( चव्हाण ) वंश में जालोर गढ जो है जो पूर्व में सोहनगढ कहलाता था । ( समय परिस्थिति के आधार पर नाम बदलते रहते हैं । जालन्धर नगर के एक तपस्वी जालन्धर नाथजी के नाम पर ही नामकरण हुआ जो अपभ्रंश होते होते जालोर वर्तमान में हो गया ।
उस सोहनगढ पर श्री सांवतसिहजी सोनगरा का राज्य था । ( सांकरणा के श्री शंभुदानजी राव के अनुसार ) इस गढ की नींव में सवामण सोना ब्राह्मणों के मंत्रोच्चारण से नींव में भरा गया । उस समय इनके राजपुरोहित श्री उरहरजी राजगुरू थे । जिन्हे अजारी से लाकर गोल गांव ( जालोर से पश्चिम दिशा आया है ) इनायत किया व अपने कुल गुरू के रूप में स्वीकार किया । उरहरजी बडे ही तपस्वी एवं शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे तथा राजकाज में भी अपने इष्ट देव का आधार पर निणयिक शक्ति का सभी लोग लोहा मानते थे ।
उरहरजी उन सभी वाओं से सम्पन्न होते हुए भी बड़ी सादगी से जीवन यापन करते । वे त्रिकाल
नियमित रूप से करते हुए अपने ब्राह्मणत्य कर्म से परिपूर्ण रहते थे । नित्य कर्म से निकृत होकर ही जालोर में श्री को दरबार में सांवतसिंह आवागमन रहता था । कहते हैं कि सुबह रवाना होते तो भी सूर्य देवता को दर्शन हो सांय लौटते वक्त भी सूर्य दर्शन सन्मुख होते हैं । तभी तरह से सम्पन्न होते हुए भी उनके उपर उदासी छायी रहती थी । राजा भी कई बार उदासी का कारण पूछने का अवसर दुड रहे थे । एक समय ! दरबार लगा हुआ था व कक्षाबनान का त्योहार था । राजाओं का हमेशा यह नियम ! रहा कि प्रथम सा बनान गुल से बंधवाकर अपनी रक्षा का मार गुरु को सौपते ! हुए समापित होती थी । बाद में अपनी बहनों के द्वारा राही बंधवा कर उनकी सा ! का भार स्वय ग्रहण करते हो तो गुरू उरहरजी द्वारा रक्षा बनान को अवसर पर राखी बाते समय भाव चिहल नेत्रों से दो बूदे राजा के हाथ पर गिरी , राजा को बडा विस्मय हुआ कि मेरे राजपुरोहितजी को ऐसे शुभ समय में कौन से दुख की याद आ गई जो मूह से नहीं कहकर इन आसपुओं द्वारा कहना चाहते हैं । राजा को काफी समय से उदासी का कारण पूछने पर उरहरजी टालते रहे परन्तु प्रापा राजा में निश्चय किया कि गुरुदेव से उनकी उदासी का कारण पूछ कर ही रहूँगा । राजपुरोहितजी ( उरहरजी ) को सभी मत्री गणों के समक्ष ही प्रार्थना कि आप निरसंकोच होकर जो भी कहना चाहे कहें , भले ही कौसी भी विषम परिस्थितियां होगी तो भी मैं आपकी इस उदासी को दूर करने की कोशिश करूगा फिर भी उरहरजी अपनी अन्तरकरण की पीडा को नही दशाँ पाये तब मंत्री गणों ने उन की उदारी का कारण राजा को बताया कि राजपुरोहितजी के कई पीढ़ियों से एक एक पुत्र ही होता आया है एवं अब यौवन अवस्था ढलने की स्थिति में पुत्र नहीं है । इसलिए ये अपनी कुल परम्परा के प्रति चिन्तित हैं कि इनके बाद आपके वंश के राजगुरू कौन ? राजा ने बड़ी गभीरता से विचार किया की मैने कभी भी इस बारे में विचार ही नही किया । हालांकि मुझे पता अवश्य था कि राजपुरोहितजी के सन्तान नही हैं
लेकिन आज परिस्थितियों को देखते हुए स्वयं भी सोचने को मजबुर हुए और काफी मंत्रणा के बाद ये निश्चय किया गया कि अजारी से इनको यशज में से किसी को गोद लिया जावें । राजा ने राजदूतों को भेजा परन्तु किसी परिवार ने अपने बच्चे को गोद देना स्वीकार नहीं किया तो पुन मंत्रणा के बाद कि राजपुरोहित समाज में से किसी भी गोत्र के बच्चे को गोद ले लिया जाये तो भी कुल गुरु परम्परा की वंश राजा सावितसिंह जी बहुत उदास व चिन्तित हुए कि क्या किया जावे । तब पन मन्त्रणा हुई , सभी मंत्रीयों की अथक प्रयासों के बावजूद चारों ओर निराशा ! हाथ लगी । तब ये निश्चय किया गया कि राजपुरोहितजी ही कोई रास्ता ! सुझायेगी । मत्रीयों की काफी अनुनय विनय करने पर राजपुरोहितजी ने शास्त्र नीति के तहत कहा कि अगर कोई राजा अपनी प्रियतम से प्रियतम वस्तु भी गुरू की मदद करे तो गुरु द्वारा स्वीकार करने का शास्त्र नियम है । ( अर्थात शिष्य को रूप में ) और गुरु समर्थ होतो क्षत्रिय से ब्रह्म - मिला सकता है । जिस प्रकार विश्वामित्र राजा प्रचण्ड तपस्या के बावजूद भी सर्षि में नहीं मिल सके परन्तु समर्थ वशिष्ठ महर्षि के सौ पुत्रों के मारने के बावजूद भी क्षमाशीलता , धैर्यता ब ! ब्रह्मा तैज के आगे विश्वामित्र का क्षात्रबल व तपस्या अस्तित्व हीन रही और जब शिवामित्र ग्लानि व प्रायश्चित की अग्नि में जलने लगे और वशिष्ठ ऋषि के पास यह तो वशिष्ठ मुनि की महानता देखियें ।
उन्होने कहा आओ ब्रह्माऋषि विश्वामित्र विस्तार से ब्रह्म पुराण महाभारत , आदि . 174 / 25 ) वशिष्ठ गोत्र वंश में ही । उतरह रखी कि बात को मत्रियों ने आपस में मंत्रणा कर राजा को कही . राजा भी ! सहर्ष तयार हो गया परन्तु एक आशंका राजा को हुई कि पुत्र तो दे दूंगा । परन्तु या ब्रह्मा समाज स्वीकार करेंगा । अगर स्वीकार करेगा तो अति सुन्दर और अगर न्यीकार नहीं करे तो मेरा देना नहीं देने के बराबर हैं । ( इसमें शंभुदानजी ( राव ) अनुसार उस समय राजा का पुत्र बाल्यावस्था में था । परन्तु साथ - साथ जनअतियों के आधार को भी रखना चाहेंगे कि जिस समय उरहरजी ने मंत्रियों को सलाह दी कि महारानी के गर्भ में पुत्र है । और अगर वह पुत्र होते ही भेट करे त ! लीकार कर सकता ह । ( अपनी योग दृष्टि द्वारा पता लगाया और समय पूरा होने पर पुत्र ही हुआ व भेंट किया गया तब कहते हैं कि उरहरजी की धर्मपत्नि के स्तनों न दा का प्रवेश होना एक बच्चे को बडा करना बताते हैं । जिस प्रकार पिप्पलाद त्रा का उल्लेख आता है कि ब्रह्माजी द्वारा अगुठे में अमृत भर का उसके द्वारा ही शिष्य अवस्था से बाल्यावस्था में प्रदेश व उसके बाद पीपल को फलों द्वारा पोषण होन ) जब ब्रह्म समाज की स्वीकृति प्रदान करने के बाद में नामकरण आदि संस्कार दिये गये तब ऋषि गौत्र भी पिप्पलाद महर्षि दिया गया । राजपुरोहित सभी को एकत्रित किया गया एवं विचार विमर्श के बाद समाज के गणमान्य प्रोति ने समाज की सहमति से मान्यता दी एवं कहा कि यह अनुचित नहीं है ।
नामकरण संस्कार में बालक का नाम शकर रखा गया व राजा ने उसे अपनी रियासत में से हिस्सा दिया । बाद में जाति को नाम दिया गया कि राजा का पुत्र ! ही राजा का गुरु बना । राय का अर्थ राजा मानते थे । राजा पुत्र ही राजा का गुरु इसलिए रायगुरु कहलाए । हमारे भ्रमण काल में पिप्पलाद ऋषि के वंशज ( मिली । जानकारी के अनुसार ) मात्र रायगुरू एवं नन्दवाणा गौत्र ही हैं । जिस प्रकार मनणा को नाधि प्रवर्तक गौतम महर्षि हैं । उसी प्रकार रायग़रों एवं नन्दवाणों को पिण्यलाद है । इन जातियों में अभी तक दूसरी जाति नहीं मिली ह । नाम उच्चारण में कहीं कहीं काया के पीछे उच्चारण होने लगता हैं । रायगुरों के वंशवृद्धि का मूल स्थान साकरणा रहा एवं नन्दवाणों का जोधपुर जिले में सालावास के पास नन्दवाण गांव उदगम स्थान रहा ( वर्तमान में वहां कोई नही रहता ) जैसे सेवडों का बडली , राजगुरो व जागरवालो का अजारी एवं पल्लीवालों का पाली इत्यादि ।
महर्षि वशिष्ठ Rajgurus का पूर्वज है। उनकी कुलदेवी सरस्वती माता है और kuldev महादेव सिरोही जिले के pindwada तहसील में Ajari पर मंदिर markandeswar है, और उनके प्रमुख गांवों Balera, Silore, थोब राजगुरू Bisurajguran, डोली, Radwa, वाणी, राजगुरु Basni, Odwada और Langera हैं। Balera गांव राजगुरु व balera गांव में हमारे कुलदेवी Koobarmataji पुराने टेम्पल के Sansan है। Silore गांव अक्सर "सासन बड़ा Silore gaanv" .village chitrodi जालोर के रूप में बोली जाती है।
कुलदेवी (सरस्वती देवी) यह कि पंवारों के पुरोहित है और अपनी पैदाईष वषिट ऋशि के अग्नि कुंड से मानते है। जो आबू पहाड़ के ऊपर नक्की तालाब के पास है। इनका बयान है कि पंवार से पहले हमारा बडेरा राम-राम करता पैदा हुआ, जिससे उनसे कहा कि तुम परमार हूं गुर राजरों यानि आप बैरियों को मारने वाले है, और मैं आपका गुरू हूं। परमार ने उसको अपना पुरोहित बना कर राजगुर पदवी और अजाड़ी गांव शासन दिया जो सिरोही रियासत में शामिल था। सबसे पुराना राजगुर पुरोहितों का है। मारवाड़ में भी सीलोर और डोली वगैरा कई गांव शासन सिवाने और जोधपुर में है, और इनकी खांपे - 1 आॅबेटा, 2 करलया, 3 हराऊ 4 पीपलीया 5. मंडार 6. सीदप 7. पीडीया 8. ओझा 9. बरालेचा 10. सिलोरा 11. बाड़मेरा 12. नागड़ा। इनमें से सीदप पहले चैहानों के भी पिरोयत हो गये थे मगर फिर किसी कारण से नाराज होकर छोड़ बैठे। अब उनकी जगह दूसरी खांप राजगुरू उनके पिरोयत है। सीदप के शासनगांव टीबाणीया, फुलाड, जुडि़या, अणरबोल, पंचपदरा, षिव और सांचैर के परगनों में थे। अभी उनके गांव के विस्तार से अनेक गांवों के निवासी है जिनमें खेजड़ीयाली, सीलुदांतीया, अणखोल, बाली, मोरसीम, भाखरपुरा, गाडेवी, डांगरीया, सीन्धासवा, सारीयाणा, वैशाला, कोमता आदि है।

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