बुज़ङ

बुझड - यह जाति भी उर्देश में से निकली हैं । ( जनश्रुतियों को आधार पर एक ! ठाकुर को मवेशी मर्सि ) राजपुरोहित उदेश के खेत पर रोजाना फसल को नुकसान पहुचाती शा । काफी कोशिश करने के बावजूद भी मवेशी नहीं रूकी तो मवेशी की अपने बाए पर बाधा दिया , बात बहुत बढ जाने के बावजूद भी ठाकुर अपनी तकराई । से मवेशी को नहीं ले जा सके और आग्रह विनती करने पर ही मवेशी लौटाई गई उसके बाद ठाकुर ने मवेशी द्वारा कभी बिगाड नहीं करवाया और उनके कठोर लवना ही कारण ताकुर ने उन्हें बुझड कहा । बुझद लौकिक भाषा में कहते है । छोटे से पौधे के असंख्य जडे होती हैं , कठोर होती हैं उसे बुझड कहते हैं । ये स्वय उदेश मानते भी हैं । ( सायला पं में 105 घर
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