हलसिया

जालोर जिले के सांचोर पं . समिति में एक गांव दाता आया हुआ है । कहते है कि भीनमाल नगर से बिखरे जोशी परिवारो ने दाता ग्राम को बसाया । इसकी सुरक्षा समृद्धि के बारे जनश्रुतियों के आधार पर भग्नावशेषों में दीवार में बावडिया , कलात्मक खण्डित मूर्तिया इस गांव की वैभवता व कला प्रेमी नगर की अद्भूत कहानी की याद दिलाती है । मुस्लिम लुटेरों ने हिन्दूओं को विध्वंस किया , लुटा एवं मूर्तियों को खण्डित भी किया । फिर भी मन मन्दिर को खण्डित नहीं कर सके । संस्कारों को खण्डित नहीं कर सकें । अथति बहुत कुछ पीछे भी रहा । सभी को साथ नहीं ले जा सकें । धीरे धीरे ये व्यवस्थित होते गये । इनकी सम्पन्नता विद्वता व शौर्यता की खुशबू दूर फैली हुई थी । गुजरात से मारवाड तक दूर तक कुछ ईष्र्यालु इनकी सम्पन्नता से जलते थे । लुटेरी जातियों द्वारा बार बार आक्रमण करवा कर लुटने की भरसक कोशिश की गई । धैर्य की सीमाएं खत्म हो गयी । घमासान युद्ध हुआ और ब्राह्मणों ने उस ललकार से पीठ नहीं दिखाई और काम
आये और पीछे सतीयों ने श्राप देकर जौहर किया और आप का असर धीरे धीरे होने लगा । उन आतताईयो का सर्वनाश होने की स्थिति पर उस परिवार के मुखिया को किसी प्रकाण्ड विद्धान ब्राह्मण ने कहा कि ब्राह्मणों को सता कर जो कुछ प्राप्त किया है वह सभी तुम्हारे वंश को खत्म कर देगा । मुखिया के उपाय पुछने पर उस विद्धान ब्राह्मण द्वारा सलाह दी गई कि अगर उन जोशी परिवार की वंशजों से क्षमायाचना करते हुए यथावत जागीरी सम्मान सौंप दी जाये और उनके वंशज स्वीकार कर ले , क्षमादान दे दे तो हो सकता हैं कि तुम्हारा कोई पू ! जन्म का पुण्य कर्म तुम्हें बचा सके । उनकी खोज की गई । येन केन प्रकारेण मिन्नत करने पर उन अबलाओं को नाबालिग सन्तानों के साथ पुन : गांव में बसाने का प्रयास किया गया । उनकी आजीविका व्यवस्थित चलाने हेतु काश्तकारों को बाहर से लाकर बसाया गया । वह प्रत्येक हल पर सेई अनाज ( चार मोणा ) देशी माप से जो वर्तमान में 14 किलोग्राम के बराबर होता है । ) यहाँ जमीन की जुताई में दे ! को कहकर पूर्व के आतताई शासकों द्वारा प्रकृति का दण्ड पाने के पश्चात पूर्व जमीन ब्राह्माणों को पुन : वापस लौटा दी । कालान्तर में हल से ही ब्राह्मण कहलाने लगे । दाता ग्राम के जोशी शब्द भूलते गये । उस समय जमीन की जरूरत नहीं थी । समय चक्र में कई परिवार इस वंश के दाता से बिखरे वे हलसेही ब्राह्मण पहचाने जाते । कालान्तर में हल से ही से हलसिया व हलिया ( अपसंश शब्द ) होते गये । हल से ही हलसिया व हलिया सभी मूल में जोशी हैं एवं दाता ग्राम से ही विस्थापित हुए है । जिसको बुजूर्ग पीढी के लोग आज भी जानते है । परन्तु कहीं आया हुआ है कई गांवो में बसे हलसियां परिवारों को पता नहीं है । मूल में जोशी होना सभी स्वीकार करते है । ( उन्ही के आधार को हमने भी प्रमाणिक माना है । )
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