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JALOR (जालोर )

जालोर जालोर शहर के पूर्व दिशा की और जोधपुर , पाली और सिरोही राजमार्ग के नजदीक ही श्री राजगुरु पुरोहित छात्रावास जालोर आया हुआ हे , कॉलेज , अस्पताल , रेलवे स्टेसन , और जिला मुख्यलय इसके बिलकुल नजदीक हे , छात्रावास का प्रवेश द्वार पर उतर दिशा की और हे , परकोट की पूर्व दिशा में नुक्कड़ पर श्री लक्ष्मीनारायण भगवान का मंदिर एवं संत श्री आत्मांनद जी महाराज का आश्रम हे , इसमे तीन ब्लाक बने हुए हे अभी छात्रावास में 75 कमरे व 2 हॉल हे , जालोर शहर के पूर्व दिशा की ओर जोधपुर , पाली और सिरोही राजमार्ग के नजदीक ही श्री राजगुरू पुरोहित छात्रावास जालोर आया हुआ हैं । कॉलेज , अस्पताल रेलवे स्टे एवं जिला मुख्यालय इसके बिलकुल नजदीक हैं । छात्रावास का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा की ओर हैं । परकोटे की पूर्व दिशा में नुक्कड़ पर लक्ष्मीनारायाण भगवान का मंदिर एवं संत श्री आत्मानंदजी महाराज का आश्रम हैं । छात्रावास में वर्तमान में 75 कमरें व 2 हॉल हैं । प्रत्येक कमरें में 2 छात्रों के रहने की व्यवस्था हैं । इसमें तीन ब्लॉक बने हुए हैं । ( १ ) प्रथम ब्लॉक - माध्यमिक विद्यार्थियों के लिए ( ) बी ब्लॉक : - 2 उच्च माध्यमिक शिक्षा तक के छात्रों के लिए ( 3 ) सी ब्लॉक - महाविद्यालय ( कालेज ) में अध्ययनरत छात्रों के आवास के लिए बनाएं गए हैं । प्रवेश द्वार कमरों का निर्माण करवाकर छात्रावास व आश्रम के रखरखाव के लिए स्थायी आय हेतु सजातिय बन्धुओं को ही किराये पर दिये जाते हैं । इस विशाल छात्रावास के प्रांगण में सरस्वती का मंदिर , विद्यार्थियों के लिए स्नानागार , शौचालय व मुत्रालय की समुचित व्यवस्था हैं । पास में एक वाचनालय व व्यवस्थापक का कार्यालय स्थित हैं । ये सभी संत श्री आत्मानंदजी महाराज की दूरदर्शिता का ही परिणाम हैं । हम संक्षिप्त में इसके अति को देखते हैं तो यह विशाल भवन कई विषम परिस्थितियों से गुजरने के पश्चात् ही पूर्ण हुआ हैं । इस भवन की आधारशिला चवन्नी फंड जीवीकोपार्जन हेतु कई बन्धु बम्बई चले आए । यहां शिक्षा की कमी के कारण किसी को रसोई कार्य मिला तो किसी को शारीरिक मेहनत का । सायंकाल अपने - अपने कार्यों से निवृतहोगी ) अपने होकर सभी ( मारवाड़ी भी कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं - आपस में दुख - सुख की बातें करते , गांवों से आए नये बन्धु से सम : छित : नौकरी तलाश करते तो कोई गांव जाता तो उसके साथ समाचार भेजते इत्यादि योजनाबद्ध रूप से संगठित नहीं होते हुए थे चौपाटी मुम्बादेवी का पाटिया , पर सांयकाल नियमित रूप से मिलते । रहते विचार होते निर्णय पहुँचे समाज में विमर्श होते - इस पर कि शिक्षा का प्रचार नितांत आवश्यक हैं । शिक्षा के अभाव में हम सभी को नौकरीयों के लिए * पडते हैं व शिक्षा का अभाव इसी तरह रहा तो आने वाली पीढ़ी की भी यहीं दः । होगी । अत : जालोर पट्टी आपस में निर्णय किया : हमारे जिले में छात्रावास बनाने के लिए चवन्नी फंड की घोषणा कर वर्षों तक चवन्नी फंड इकट्ठा होता रहा । जब भूमि खरीदने योजना बनी तो जालोर पट्टी ने कहा कि जिले मुख्यालय पर ही जमीन ली जावे परन्तु ढंढार पटटी लोगो ने जमीन सांथू ग्राम में लेने को कहा , इस तरह मतभेद होने से एकत्रित फंड दो भाग कर , चवन्नी फंड प्रतिस्पर्धा के रूप में जारी रखा इधर श्री वीरमारामजी ने छात्रों के लिये एक ( 1985 ) में किराये पर मकान लेकर किसान छात्रावास की शुरूआत की । यह कई वर्ष तक चलता रहा । समाज के दूर दराज के छात्र इसका लाभ लेते रहे । इसमें वीरमारामजी की सेवाएं सराहनीय रही । इसी दरम्यान बम्बई चवन्नी फंड के सदस्यों ने भूमि लेने के ! लिये 1964 में जेठमलजी सांकरणा के साथ इकट्ठी की हुई राशि भेजी । जेठमलजी ने वीरमारामजी से मिलकर विस्तृत रूप से विचार विमर्श किया और रकम को सबकी सहमति से बैंक में जमा करा दी गई और व्यवस्थित जमीन देखने के लिये समय का इन्तजार करने और एक 5 बीघा भूमि ( नगर में नगरपालिका के पीछे एक नाई का खेत था उस समय एकांत में थी परन्तु दूरदर्शी बन्धुओं को लगा कि आने समय में ये क्षेत्र विकास के दायरे में अवश्य आयेगा । 11 सदस्यों की ट्रस्ट बनाकर भूमि का पट्टा ट्रस्ट के नाम करवा दिया । इसमे हमीरसिंहजी जागरवाल ( आकदड़ा ) नायब तहसीलदार थे ) । ने अच्छा सहयोग दिया । जेठमलजी सांकरणा भभूतजी बौछावाड़ी इत्यादि अगुवाई करने वालें कालन्द्री पहुँचे और संत श्री आत्मानन्दजी से प्रार्थना की हमने अभी तक पाँच बीधा जमीन लेकर चार कमरे व एक कच्चा रसोडा बनाया हैं । हमारे पास जो जमा पूंजी थी । उससे अधिक खर्च हो गया हम बड़ी दुविधा में फंस गये और यह कार्य आप अपने हाथ में ले तो हम सभी तन - मन - धन से हमारी समर्थता के अनुसार समर्पित हैं । वैसे किसी का क्षेत्र सन्ता नाकाता क्षेत्र के ले . कुशलता के सांसारिक प्रपंचों से हटकर अपना सारा जीवन आत्म कल्याण से होता हैं , किन्तु कुछ बिरले ही संत ऐसे होते हैं । जो अपना हित ( आत्म कल्याण ) भूलकर सारा जीवन दसरों के दुखों को दूर करने में खपा देते हैं । उन सन्त महापुरुषों में एक नाम आत्मानंदजी महाराज का लिया जाता । संत श्री की ब्रह्म समाज में शिक्षा के दीप जगह - जगह जलाने की तमन्ना थी । सहर्ष प्रस्ताव स्वीकार कर कहा कि चातुर्मास पूरा होने पर मैं तुम्हारे साथ रहुंगा तुम्हें किसी तरह से चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं । संत श्री ने कह तो दिया परन्तु आसान काम नहीं था । वे स्वयं भी इसे समझते थे । विक्रम संवत् 2025 को भीषण अकाल फिर भी संत श्री ( कर्मयोगी ) हिम्मत हारने वालों नहीं को इकट्ठा कर आहोर व जालोर तह में हर परिवार से प्रतिवर्ष 2 रूपये इकट्ठे करने शुरू किये व स्वयं चन्दा लेने भभूतजी को साथ लेकर (ीचछावाड़ी ) अहमदाबाद , बम्बई . पूना तक 3 माह की यात्रा कर लौटे । इसमें गरीब मजदुर भाईयों का विशेष सहयोग रहा । लोगों ने दिल खोलकर अपनी समर्थता के बाहर भी सहयोग किया । संत श्री ( आत्मानंदजी महाराज ) अपने इष्टदेव से प्रार्थना करते हैं । कि हे प्रभु मेरे इन श्रद्धालुओं की तरफ भी कृपा दृष्टि रखना । रास्ते में बम्बई में भभूतजी की रामेश्वरजी बिडला की गाड़ी से दुर्घटना के शिकार हो गये तब संत श्री से रामेश्वरजी बिड़ला से मिलकर उचित ईलाज की व्यवस्था कराई । संत श्री जमीन को आबादी में मिलाने के लिये कई बार कार्यकर्ताओं को कहते तो जवाब मिलता कि स्वामीजी अपने आप कार्यवाही की हुई है । ट्रस्टियों के नाम नोटिस हो गये एवं अवैध , गैर कानुनी निर्माण के खिलाफ कार्यवाही शुरू हो गई । किसी की सलाह पर रजिस्ट्री पुन : संत श्री के नाम करवाई गई । क्योंकि अगर एक आदमी के नाम की हो तो आबादी में शामिल कराने में आसानी हो जायेगी । परन्तु समस्या वैसी ही बनी रही व आखिर जिला कलेक्टर फैसला दिया । चूंकि आप जाति विशेष का छात्रावास बना रहे हैं अत : 5 जमीन नही दी जा सकती चाहें तो यह भूमि आपको सकती हैं । संत श्री फिर भी निराश नहीं हुये उस समय राजस्थान के पूर्व मुख्य श्री मोहनलाल सुखाडिया एवं श्री मथुरादास माथुर जालोर आये हुए थे । संत श्री भी इनसे मिलने गये और कहा । क्या राज्य सरकार को साधुओं द्वारा विकास कार्य करने में एतराज हैं ? मुख्यमंत्री ने कहा कि नही महाराज , ये आपको किसने कहा , कहो क्या बात हैं ? तब संत श्री ने सारगर्भित बात दोहराई में

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